हिमाचल पर मंडरा रहा उत्तराखंड जैसी आपदा का खतरा! 4 नदियों के बेसिन में बनीं 935 झीलें

शिमला: उत्तराखंड के चमोली में हुई जल प्रलय ने बड़े खतरे की ओर संकेत किया है. पूरे हिमालय क्षेत्र में बड़े बवंडर की आहट है. पश्चिमी हिमालय में जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिसके चलते हर साल प्राकृतिक झीलों के बनने का सिलसिला जारी है. हिमाचल प्रदेश के विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद के सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के मुताबिक प्रदेश की सतलुज, रावी, चिनाव और ब्यास नदी के बेसिन में 935 झीलें बन गई हैं. चमोली जैसी घटना हुई तो यह हिमाचल में बड़ी तबाही मचा सकती है. साल 2005 में पारछू झील के टूटने से हुई भीषण तबाही के संकेत नजर आ रहे हैं. परिषद के मेंबर सेक्रेट्री निशांत ठाकुर ने इस खतरे की पुष्टि की है. ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से मौसम में भारी परिवर्तन हो रहा है, जिसके चलते ताममान में बढ़ौतरी हो रही है और ग्लेशियर पिघल रहे हैं.

निशांत ठाकुर ने जानकारी दी कि जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदेश में अनियमित रूप से बारिश और बर्फबारी हो रही है. कभी अत्यधिक बारिश हो रही है तो कभी सूखे जैसी स्थिती बन रही है. बर्फ पड़ने के समय में भी बदलाव हो रहा है. उन्होंने कहा कि हिमाचल और इसके साथ लगते हिमलायी क्षेत्र में सेटेलाइट बेस्ड स्टडी के माध्यम से करीब 33 हजार स्कवेयर किलोमीटर में फैले ग्लेशियर क्षेत्र का अध्ययन किया गया. अध्ययन से पता चला है कि सतलुज रिवर बेसिन में फैले ग्लेशियर में साल 2016 में 581, 2017 में 642, 2018 में 769 और 2019 में 562 झीलें बन गई हैं. चिनाब बेसिन में जिनमें मुख्यत: चंद्रा, भागा, मियाड़ सब बेसिन हैं. इनमें साल 2016 में 133, 2017 में 220, 2018 में 254 और 2019 में 242 झीलें बनीं. इसी तरह ब्यास बेसिन में वर्ष 2019 में 93 और रावी बेसिन में 38 नई झीलें बन गई हैं. हर साल औसतन 80 से 100 नई झीलें बन रही हैं.

निशांत ठाकुर के मुताबिक एक साइंटिफिक स्टडी में यह बताया गया कि साल 1970 से 2020 तक हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन की वजह से एक डिग्री तापमान बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि इसका सीधा असर कृषि, बागवानी, भूमिगत जल से लेकर पूरी प्रकृति और मानव जाति पर सीधे तौर पर पड़ रहा है. प्रदेश की राजधानी शिमला में बीते सालों में उत्पन्न हुआ जल संकट इसका बड़ा उदाहरण है. निशांत ठाकुर ने कहा कि विकासात्मक गतिविधियों को रोका नहीं जा सकता, लेकिन सतत विकास से कुछ हद तक खतरे को कम किया जा सकता है. निर्माण से लेकर कार्बन उत्सर्जन तक तमाम गतिविधियां सावधानीपूर्वक करनी होंगी.

साल 1993 से वर्ष 2001 तक के डाटा के अध्ययन से पता चलता है कि ब्यास बेसिन में 51 ग्लेशियर, पार्वती सब बेसिन में 36, सैंज सब बेसिन में 9, सतुलज बेसिन में 151, स्पीति सब बेसिन में 71, बास्पा सब बेसिन में 25 और चिनाब बेसिन में 457 ग्लेशियर हैं. ये सैकड़ों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए हैं.

सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज के मुख्य विज्ञानी डॉ. एसएस रंधावा ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के चलते इन सभी ग्लेशियरों का आकार लगातार घट रहा है. नई तकनीक के माध्यम से सेटेलाइट स्टडी और अन्य अध्ययनों से पता चला है कि ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. तापमान बढ़ने के अलावा और भी कई कारण हैं, जिसके चलते इनका आकार घट रहा है. अनियमित बारिश और बर्फ भी एक कारण है. उन्होंने कहा कि चमोली में हुई घटना में अब तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि ग्लेशियर टूटा है या किसी झील के कारण यह तबाही हुई.

हिमाचल की अगर बात करें तो सतुलज बेसिन में अधिकतर झीलें तिब्बत के इलाके में बनी हैं, जो चीन के अधीन है. इस क्षेत्र में जो झीलें बनीं हैं, उसका सीधा प्रभाव हिमाचल में ज्यादा है. हाई रेजॉल्यूशन की तकनीक के इस्तेमाल से सेटेलाइन तस्वीरों में ये झीलें साफ नजर आ रही हैं. ये झीलें एक बड़े खतरे की ओर इशारा कर रही हैं.

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