सिस्टम से हार गयी जिंदगी : रांची में पिता की जान बचाने के लिए बेटी लगाती रही अस्पतालों के चक्कर, किसी ने नहीं किया भर्ती, कोरोना मरीज ने तोड़ा दम

रांची. झारखंड में कोरोना को लेकर किये गए खोखले वादे का खामियाजा एक बेटी को अपने पिता की जान गंवाकर भुगतना पड़ा. यह बेटी कोडरमा से लेकर रांची तक अपने पिता की जान बचाने के लिए जद्दोजहद करती रही, लेकिन सारे प्रयास बेकार साबित हुए. पहले निजी क्लिनिक फिर रांची का डोरंडा कोविड अस्पताल, फिर पारस कोविड सेंटर और अंत में रिम्स कोविड सेंटर पहुंचते-पहुंचते पिता की सांसें थम गईं. कोडरमा के राजकुमार जिंदगी की जंग हार गये.

कोरोना से जंग में जंक लगी व्यवस्था के चलते हार चुकी पूजा कहती है कि कोरोना पॉजिटिव उसके पिता को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल दौड़ाया जाता रहा. कभी निजी अस्पताल तो कभी रिम्स, कभी डोरंडा अस्पताल तो कभी पारस सेंटर, पर कहीं बेड नहीं तो कहीं सुविधा नहीं का बहाना बनाकर भर्ती नहीं लिया गया. अंत में पापा हमलोग को छोड़ चले गए.

लापरवाही का आलम बस इतना ही नहीं है. राज्य के सबसे बड़े अस्पताल रिम्स में मांडर का एक मरीज भर्ती होता है. बिना परिजन को कुछ बताए उसे कोरोना सेंटर में शिफ्ट कर दिया जाता है, जहां उसकी मौत हो जाती है. अब परिजन सवाल कर रहे हैं कि शव का वह क्या करे, क्योंकि कोरोना से हुई मौत के लिए ICMR का गाइडलाइन जारी है.
मांडर के मृतक के बेटे सचिन्द्र का सवाल है कि वह अपने पिता का अंतिम संस्कार कैसे कर पाएगा, क्योंकि कोरोना संक्रमित की मौत पर अंतिम संस्कार के लिए गाइडलाइन का पालन करना पड़ता है.

यही नहींं रिम्स में एक कोरोना पॉजिटिव महिला की मौत डायलिसिस के अभाव में हो गया. मृतक देवंती के पति का कहना है कि पहले सप्ताह में दो बार उनकी पत्नी का डायलिसिस होता था. लेकिन रिम्स में एक सप्ताह में एक बार भी नहीं हुआ. जिससे उनकी पत्नी चल बसी.

रिम्स में कोरोना टास्क फोर्स के संयोजक डॉ. प्रभात कुमार कहते हैं कि कोरोना मरीजों की संख्या ज्यादा और मानव संसाधन कम होने के चलते कुछ परेशानी है. लेकिन जल्द ही कर्मियों की बहाली कर व्यवस्था में सुधार लाया जाएगा.

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