बिहार के गांवों में पहुंचा कोरोना, चार दिन में छह नए जिलों में मिले मरीज

बिहार में कोरोना वायरस से संक्रमण के फैलाव का ताजा दौर ज्यादा संवेदनशील है. बीते तीन- चार दिनों से संक्रमण के जो मामले सामने आ रहे हैं, उनमें ज्यादातर गांवों के हैं. अब तक संक्रमण का दायरा ज्यादातर शहरों में सीमित था. इस अर्थ में अब पंचायतीराज संस्थाओं के जन प्रतिनिधियों और समाजसेवी संस्थाओं की जवाबदेही भी ज्यादा बढ़ गई है. साथ ही क्वारंटाइन केन्द्रों पर सुविधाओं के साथ वहां रखे गए लोगों पर निगरानी भी बढ़ानी होगी. मिल रही खबरों के मुताबिक दूसरे प्रदेशों में आर्थिक तंगी और अन्य परेशानियां ज्यों- ज्यों बढ़ रही हैं, प्रवासी बिहारी अनेक माध्यमों का सहारा लेकर लौटने लगे हैं. इसमें माल वाहक ट्रकों से लेकर प्राइवेट गाड़ियां महंगी दरों पर बुक कराकर भी लोग आ रहे हैं.

बीते तीन चार दिनों में आधा दर्जन से अधिक नए जिलों में संक्रमित मरीज मिले हैं. इस तरह मंगलवार तक राज्य के 28 जिले कोरोना की जद में आ गए। इसमें 13 जिले सर्वाधिक प्रभावित हैं. मुंगेर हॉटस्पॉट बन गया है। पटना, नालंदा, सीवान और रोहतास जिलों में मरीजों की संख्या तीस पार कर चुकी है. आठ जिलों में संक्रमितों का आंकड़ा दो डिजीट में पहुंच चुका है. शुरुआती दिनों में धीमी संक्रमण की रफ्तार अचानक तेज हो गई है. इन सबसे बड़ी चिंता का विषय है, ग्रामीण क्षेत्र में संक्रमण का फैलाव. औरंगाबाद, मधुबनी, अररिया, कैमूर, मुंगेर, रोहतास, नवादा, बांका, गोपालगंज समेत कई जिलों में ग्रामीण इलाकों में नए मरीज मिले हैं. मधुबनी, दरभंगा, पूर्णिया ऐसे बड़े जिले हैं, जहां रविवार तक एक भी संक्रमण का मामला नहीं था. सोमवार को मधुबनी जिले में अलग- अलग इलाकों के पांच के सैंपल पॉजिटिव पाए गए. तब से वहां लोगों में दहशत पैदा हो गई है.

दरअसल, लोगों में डर पैदा होने की बड़ी वजह बाहर से आए संक्रमितों की लापरवाही है. खबरें आ रही हैं कि मुंबई, दिल्ली और देश के अन्य शहरों से जो लोग किसी प्रकार छिप- छिपाकर अपने- अपने गांव पहुंचे, उनमें ऐसे लोगों की भी संख्या कम नहीं हैं, जो क्वारंटाइन की शर्तों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं. बीते दो दिनों में जिनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है, उनमें अनेक ऐसे हैं जो क्वारंटाइन सेंटरों से बाहर निकल कर न केवल अपने गांव और चौक- चौराहों पर लोगों से मिलते- जुलते रहे, बल्कि सगे- संबंधियों से मिलने दूसरे गांवों में भी गए. अब इनके गांव और आस-पड़ोस के गांवों में भय पैदा होना लाजिमी है. वैसे भी तमाम प्रचार, अपील और सख्ती के बावजूद गांवों के अंदर अबतक लॉकडाउन शहरों और मुख्य सड़कों की तरह प्रभावी नहीं है. आपस में मिलना- जुलना सामान्य है. हालांकि बड़ी संख्या में ऐसे गांव भी हैं जहां बाहर से आने वालों को गांव में सीधे प्रवेश नहीं दिया जा रहा है. लेकिन ऐसी सतर्कता तब सामने आती है, जब आस-पड़ोस के किसी गांव में संक्रमण का कोई मामला उजागर हो जाए.

सूत्रों की मानें तो गांवों में स्कूलों या सामुदायिक भवनों में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटरों में सुविधाएं नहीं होने के कारण भी क्वारंटाइन किए गए लोग कोई न कोई बहाना बनाकर वहां से बाहर निकल जाते हैं. अब जबकि ग्रामीण इलाकों में बाहर से आए लोगों में संक्रमण के मामले सामने आ रहे हैं, तो स्थानीय प्रशासन के अलावा पंचायतों और समाजसेवी संस्थाओं की जवाबदेही अब काफी बढ़ गई है. बाहर से आने वालों को जांच और उसकी रिपोर्ट आने तक हर हाल में लोगों के संपर्क से दूर रखना होगा. साथ ही क्वारंटाइन सेंटरों को रहने के लायक बनाने के अलावा वहां निगरानी भी बढ़ानी होगी. यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि गांवों में संक्रमण के तेजी से पांव पसारने का खतरा है. राज्य सरकार ने पंचायतों को माइक से प्रचार कर लोगों को जागरूक करने की जिम्मेदारी सौंपी थी. पंचायतों को चाहिए कि वह लोगों को जागरूक करें कि अगर दूसरे प्रदेशों से कोई देर रात भी छिप छिपाकर घर पहुंचता है तो उसे अंदर प्रवेश न दें और तत्काल इसकी सूचना दें, ताकि उन्हें क्वारंटाइन सेंटर पर पहुंचाया जा सके. ऐसे लोगों का यात्रा वृतांत मसलन वे गांव तक कैसे आए, कितने लोगों के साथ आए, बाकी लोग कहां- कहां के थे, आदि भी उसी समय दर्ज कर लेना चाहिए.

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