कोठी के फर्स्ट फ्लोर के 4 कमरों में बनाए गए 7 छोटे केबिन, जिनमें रहती थीं 14 लड़कियां

चंडीगढ़ : गांवों से बच्चे पढ़ने और नौकरी करने के लिए चंडीगढ़ आते हैं. यहां कोई गवर्नमेंट हाॅस्टल जरूरत के मुताबिक नहीं है. नतीजा बच्चों को मजबूरी में पीजी में रहना पड़ता है. ज्यादा पैसे के लालच में ज्यादातर सेक्टरों में लकड़ी और फाइबर के बच्चों के लिए बनाए गए हैं डेथ चैंबर्स. पीजी बच्चों को जगह प्रोवाइड करवाने के लिए नहीं, बल्कि बिजनेस बन चुका है.

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सेक्टरों में लोग अपने घरों में पीजी का बिजनेस चला रहे हैं. न तो इनमें पूरी सुविधा होती है और दूसरा बच्चों की सिक्योरिटी को लेकर कोई काम नहीं होता. जिन कमरों में बच्चों को ठहराया जाता है, उनमें छोटे बाथरूम से भी कम जगह होती है. शनिवार को सेक्टर-32 में जिस कोठी में हादसा हुआ, उसमें चार कमरों में सात केबिन बनाए गए थे. इनमें 14 लड़कियां रह रही थीं.

पिछले करीब 6 महीनों में ही 100 से ज्यादा पीजी को नोटिस जारी हुए. इसमें से 108 पीजी को लेकर तीनों एसडीएम के पास अब सुनवाई चल रही है. डिप्टी कमिश्नर मनदीप सिंह बराड़ ने कहा कि उन्होंने तीनों एसडीएम को कहा गया है कि वे पीजी को लेकर चल रहे मामलों पर जल्द कार्रवाई करें. इस्टेट ऑफिस और एसडीएम ऑफिस रेगुलर इंस्पेक्शन पीजी को लेकर कर रहे हैं, जिसको तेज करने के लिए कहा गया है.

एरिया एसडीएम की जिम्मेदारी होती है अवैध गतिविधि पर नजर रखने की

अगर किसी भी बिल्डिंग में कोई वाॅयलेशन होती है तो इसको चेक करने की जिम्मेदारी स्टेट ऑफिस के तहत आते बिल्डिंग ब्रांच की होती है वहीं एरिया वाइज सब डिविजनल मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी होती है कि एरिया में किसी भी तरह की अवैध गतिविधि पर नजर रखी जाए. अवैध पीजी पर नजर रखने को लेकर दोनों ही सरकारी एजेंसियां फेल साबित हुई है, इसके चलते दर्दनाक घटना चंडीगढ़ में सामने आई है क्योंकि अगर चेकिंग होती और पीजी पर कार्रवाई की जाती तो 3 बच्चियों की जिंदगी बचाई जा सकती थी. डिप्टी कमिश्नर ने जांच एसडीएम साउथ को दी गई है जिसमें उन अफसरों की जिम्मेदारी तय करने के लिए कहा गया है, जिनको इस तरह की गतिविधियां चेक करनी थी वह चाहे स्टेट ऑफिस का हो या फिर पुलिस डिपार्टमेंट.

थाना एसएचओ ने जांच क्यों नहीं करवाई
5 फरवरी 2019 को नीतीश बंसल पर अवैध रूप से पीजी चलाने का मामला दर्ज किया गया था. फाइन लगाकर छोड़ दिय गया. उसके बाद कभी इस पीजी की जांच नहीं की गई. यह हादसा सेक्टर-34 थाना क्षेत्र में हुआ है. पीजी चेक करने की जिम्मेदारी बीट स्टाफ की होती है और सुपरविजन एसएचओ का. थाना पुलिस की यह गंभीर चूक है जिसके लिए जिम्मेवारी थाना एसएचओ की बनती है.

फायर डिपार्टमेंट
कोठी में इतना बड़ा पीजी चल रहा था, इसमें आग को लेकर इंतजाम किए गए हैं या नहीं, इसको लेकर फायर की ओर से कभी चेकिंग तक नहीं की गई.

डीसी को भेजेंगे लेटर, कमर्शियल घोषित किए जाएं पीजी 
रेजिडेंशियल बिल्डिंग में चेकिंग नहीं की जाती है क्योंकि नियमों के हिसाब से ऐसा नहीं किया जा सकता है. इसलिए डिप्टी कमिश्नर ऑफिस में लेटर भेजेंगे ताकि जो भी पीजी चल रहे हैं उनको कमर्शियल घोषित किया जाए. उसके तहत फिर फायर डिपार्टमेंट जाकर रेगुलर चेकिंग इनमें कर सके कि कितना काम बच्चों की सेफ्टी के लिए इनमें किया गया है.
-अनिल गर्ग, एडिशनल कमिश्नर एमसी कम चीफ फायर ऑफिसर

इन सेक्टरों में सबसे ज्यादा पीजी 

सेक्टर-15, 16, 18, 19, 20, 21, 22, 27, 28, 31, 32, 34, 35, 36. 37, 38, 46, 23 में अधिक पीजी चल रहे हैं. असिस्टेंट इस्टेट अफसर (एईओ) मनीष कुमार लोहान ने कहा कि शहर की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन और बाकी लोगों को अवेयर किया जाएगा ताकि अगर कहीं पर पीजी चल रहा है तो उसको लेकर शिकायत वे इस्टेट ऑफिस से कर सकें. तीनों एसडीएम को अपने-अपने एरिया में रेगुलर इंस्पेक्शन को लेकर कहा गया है.

नोटिफिकेशन- एक बच्चे के लिए कम से कम 50 स्क्वेयर फीट होना चाहिए स्पेस (बिना सामान के) 
2006 में यूटी प्रशासन ने एक नोटिफिकेशन पीजी को लेकर जारी की. नोटिफिकेशन के हिसाब से 7.5 मरला या इससे ज्यादा बड़े मकान में ही पीजी चला सकते हैं. पांच स्टूडेंट्स पर एक इंग्लिश टायलेट होना जरूरी किया गया. जिस बिल्डिंग में पीजी चलाया जाएगा, उसमें मालिक रहना अनिवार्य है. एक स्टूडेंट के लिए कम से कम 50 स्क्वेयर फीट की जगह होनी चाहिए, जो कि बिना किसी सामान यानि अलमारी या बाकी सामान के गिनी जाएगी.

मतलब ये कि ऐसा कमरा जिसमें कोई अलमारी नहीं है, टेबल नहीं और एरिया 150  स्क्वेयर फिट है तो ही इसमें तीन बच्चों को ठहराया जा सकता है. लेकिन अगर कमरे में सामान रखा गया है जितने एरिया में सामान है उसको काउंट नहीं किया जाएगा यानि खाली एरिया ही 150 स्क्वेयर फीट का होना चाहिए. जिस एरिया में पीजी होगा वहां के पुलिस स्टेशन में उन लोगों को लेकर रिकाॅर्ड जमा करवाना जरूरी जो यहां रह रहे होंगे.

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